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Friday, July 04, 2008

तुम हो एक हवा का झोंका

तुम हो एक हवा का झोंका

आओ के ना आओ तुम

कब से आंखें तरस रही हैं

अब तो दरस दिखाओ तुम


बाग़ बगीचे खिल उठते हैं

आहट तेरी पाते ही

फ़िर खामोशी छा जाती है

बस तुम्हारे जाते ही


सूख गयी हैं लब पंखुडियाँ

ओंस ज़रा टपकाओ तुम

मारू थल में पड़ा हुआ हूँ

आके प्यास बुझाओ तुम


बहुत हो गयी अब जुदाई

काटा बहुत अकेलापन

अब तो तुम ऐसे आ जाओ

फिर ना वापस जाओ तुम


तुम हो एक हवा का झोंका

आओ के ना आओ तुम