रोज़ मिलते है लोग
पास आते हैं
हँसते हैं, खेलते हैं
कुछ समझते भी हें
लेकिन ,
कभी इस तरह से
मिलता है कोई
छू जाता है
दिल के तारों को
गूँज उठता है संगीत फिर
गीत बन जाते हें बातों के
यह ज़िंदगी फ़िर लगती है
इक ग़ज़ल
और सारी दुनिया
इक महफिल
जब भी कभी कुछ दिल को छू जाता है तो लग जाते हैं पंख मेरी कल्पना को और उड़ निकलता हूँ ऊंचे आसमान में। तभी ज़िंदा हो उठती है कोई कविता या कहानी । यही तो है मेरी कल्पना की उड़ान