Friday, August 24, 2007

जागो भारत के वीरो

(यह पंक्तियां मेरे पिता जी ने 1962 के चीन युद्ध के समय लिखी थी। नौं साल बाद 1971 के पाकिस्तान युद्ध के समय, मैंने एक लेख लिखा था जिसे मैंने शिमला रेडियो स्टेशन पर पढ़ कर सुनाया था। लेख का अंत मैंने इन पंक्तियों से ही किया था। आज के माहोल में भी यह पंक्तिआं कितनी सही बैठती हैं )

जागो भारत के वीरो

ज़माना है आज़मायिश का

छोड़ दो ऐशो-इशरत

कि समय नही नुमायश का


तोड़ दो सर दरिंदों के

के मुड़ कर ना इधर आयें

ऐसा वार करो उन पर

की दुम्ब दबा कर भाग

Saturday, August 04, 2007

जब पहली बार देखा था तुम्हें

जब पहली बार देखा था तुम्हें

तुम घिरी हुई थी

अपनी सखियों में

और मैं अपने संबंधियों में

एक हल्की सी मुस्कान थी

तुम्हारे चहरे पे

शायद थोडी घबराहट भी

और उसी घबराहट में तुम

कभी उंगली पर दुपट्टा लपेटती ]

और कभी

उँगलियों को दबाती

अपने हाथों से ।

कितना जीं चाहा था

उन हाथों को उसी दम

अपने हाथों में ले लेने का और

मन ही मन वादा कर दिया था

उन हाथों को जीवन भर

थाम के रखने का